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Diya Sain is India's one of the best Indian Women Kushti wrestler of present day, scoring 80 medals till date. She is from a family of wrestlers. Her father Suraj Pahalwan and Grand father Sh. Rajinder Singh of Village Purbalian, District Mujaffar Nagar Uttar Pardesh , were also very fine wrestlers of their time. Suraj Pahlwan wanted to make his son Dev Sain a good wrestler. Divya followed on the footsteps of her brother at a very young age . Although from a fortune less family , she went on to become a champion in India.
Wednesday, June 20, 2018
Thursday, December 28, 2017
महिला पहलवान दिव्या सैन को नहीं मिला प्रो रेसलिंग लीग में मौका।
महिला पहलवान दिव्या सैन को नहीं मिला प्रो रेसलिंग लीग में मौका। कुश्ती कला में शिखर की ओर अग्रसर दिव्या सैन आज भारत वर्ष की एक बेहतरीन महिला पहलवानो में हैं । दिव्या सैन , गाँव पुरबालियान , जिला मुज्जफर नगर , उत्तर प्रदेश निवासी सूरज पहलवान की बेटी हैं। दिव्या सैन ने महज आठ साल की उम्र से ही अखाडा गुरु राजकुमार गोस्वामी व् बाद में अखाडा गुरु प्रेमनाथ में कुश्ती कला में निपुणता हासिल की। दिव्या सैन ने कुश्ती में कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं। उन्होंने मिटटी , मैट के दंगलों में , महिला ही नहीं पुरुष पहलवानो को भी चित कर कुश्तियां जीती हैं । दिव्या की सफलताएं इस प्रकार हैं।
कामनवेल्थ चैंपियनशिप - 1 गोल्ड मैडल। एशिया चैंपियनशिप - 1 गोल्ड , 2 सिल्वर , 2 ब्रोंज पदक। ( सब जूनियर , जूनियर व् सीनियर ) वर्ल्ड चैंपियनशिप - पाँचवाँ स्थान। ( सब जूनियर) सीनियर नेशनल गेम्स - 1 ब्रोंज मैडल नेशनल चैंपियनशिप - 11 गोल्ड , 2 सिल्वर , 2 ब्रोंज. सब जूनियर , जूनियर व् सीनियर ) दिल्ली स्टेट चैंपियनशिप - 17 गोल्ड मैडल ( स्कूल सब जूनियर , जूनियर व् सीनियर ) उत्तर प्रदेश स्टेट चैंपियनशिप - 2 गोल्ड मैडल इण्टर यूनिवर्सिटी - 3 गोल्ड मैडल चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी - 3 गोल्ड मैडल केसरी के खिताब - 6 बार भारत केसरी , 1 राजस्थान केसरी , 1 महारानी किशोरी , 2 उत्तर प्रदेश केसरी , 1 जम्मू कश्मीर प्रदेश केसरी। दिल्ली ओलिंपिक गेम्स - 1 गोल्ड मैडल राजीव गांधी गोल्ड कप - 1 सिल्वर मैडल चन्दगी राम गोल्ड कप - 1 सिल्वर , 2 ब्रोंज। कुल पदकों की संख्या - 62 कामनवेल्थ चैंपियनशिप - 1 गोल्ड मैडल।
यदि किसी भी कसौटी पर पहलवान दिव्या सैन को जांचा जाय तो वह देश के शीर्ष पहलवानो में अपना स्थान बनाये हुए हैं। भारत केसरी का ख़िताब जीतना भी मायने रखता हैं , साथ ही सैकड़ों हजारों लोगो की भीड़ में पुरुष पहलवानो से लोहा लेना अपने आप में एक अनोखी बात ही कही जायेगी। इसी वर्ष जून में 55th डान कोलोव एवं निकिता पेत्रोव इंटरनेशनल कम्पटीशन बुल्गारिया में हुआ था जिसमे भारत के 28 पहलवानो ने भाग लिया। ग्रीको रोमन , फ्रीस्टाइल व् महिला फ्रीस्टाइल तीनो वर्ग में ये कम्पटीशन हुआ। जिसमे बजरंग पुनिया पहलवान का सिल्वर मैडल , ऋतू फोगट ब्रोंज मैडल तथा दिव्या सैन ब्रोंज मैडल लेकर देश का नाम ऊंचा किया।
जिस दिन प्रो रेसलिंग लीग के ऑक्शन हुए , उसके रिजल्ट में पहलवान दिव्या सैन का नाम न देखकर मुझे बहुत दुःख हुआ। पहलवान दिव्या सैन क्यों प्रो रेसलिंग लीग में खेलने की हकदार बनती हैं इस बाबत मैंने अपनी फेसबुक लाइव फीड और यूट्यूब चैनल पर भी बोला। आप भी देख सकते हैं।
इस महिला पहलवान के जीवन पर यूँ तो बहुत कुछ लिखा , बोला जा चूका हैं। लेकिन संक्षेप में आपको बता दूँ की दिव्या एक गरीब परिवार से हैं। जो नाई ( सैन समाज ) बिरादरी से ताल्लुक रखती हैं। और ये तो सब जानते ही हैं की किस तरह उसके पिता ने लंगोट बेचकर अपनी बेटी को पहलवान बनाया। दिव्या के बारे में स्वयं नेता जी माननीय सांसद व् भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष श्री ब्रजभूषण शरण सिंह जी ने भी आम जनमानस को बताया , ताकि कुश्ती के खेल में और बेटियां भी आएं और भले ही वे गरीब हों , दिव्या की तरह नेशनल चैंपियन बने। लेकिन दुःख तब होता हैं जब कुछ लोगों को ये रास नहीं आता। वो किसी भी तरह से आगे बढ़ती हुई इस पहलवान के रास्ते में रोड़े अटकाने से जरा भी नहीं चूकते। अब सवाल यह हैं की अगर इस तरह हिन्दुस्तान में गरीब और निचले तबके से आ रहे खिलाडियों के साथ दुर्भावना पूर्ण व्यवहार होता रहेगा तो कैसे खिलाडी आगे निकलेंगे , उनके माता पिता कैसे अपने बच्चों को खेलने भेजेंगे ?
आज के युग में द्रोणाचार्य नहीं दुर्योधन की जरूरत है। महाभारत काल से आज तक न जाने कितने द्रोणाचार्यों ने अनेकों अनेक एकलव्यों का अंगूठा लेकर उनकी प्रतिभा का गला घोंट दिया। अनेकों अनेक कर्ण सरीखे धुरंधर प्रतिभा के धनियों को अवसरों से वंचित कर दिया। अगर खोजें तो एक लम्बी लिस्ट निकलेगी। लेकिन एक दुर्योधन ही था जो कर्ण के पक्ष में खड़ा हुआ था । उसने एक सूत पुत्र को राज सिंहासन देकर अपना मित्र बनाया और अपनी प्रतिभा को दर्शाने का मौका दिया था । मुझे ये लिखते हुए दुःख तो होता हैं लेकिन सच में आज दुर्योधन सरीखे उन प्रतिभाओं का सम्मान करने वाले , उन्हें मौका देने वाले मित्रों की कमी जरूर खलती हैं।
BJJ Scout: Divya Sain Fireman's Carry Highlight/Study
Tuesday, November 21, 2017
राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में दिव्या काकरान ने 68 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीता.
जब पहलवानों के कपड़े बेचने वाले पिता के गले में डाला बेटी ने गोल्ड मेडल
राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में दिव्या कारान ने 68 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीता.





इंदौर : दिव्या काकरान भारतीय कुशती में नया नाम नहीं है. वह एशियन चैम्पियनशिप में सिल्वर मेडल जीत चुकी है. लेकिन राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में अभी तक गोल्ड नहीं जीता था. लेकिन खास बात यह है कि उसकी साधारण पृष्ठभूमि के रहते वह गोल्ड मेडल जीत सकी. यह बात सामने आई मध्यप्रदेश के इंदौर में आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती चैम्पियनशिप के दौरान.
यह कुछ कुछ फिल्मी अंदाज में ही हो गया जब 19 साल की दिव्या ने 68 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड जीत कर बाहर की दौड़ लगा दी तो किसी को समझ ही नहीं आया कि दिव्या कहां जा रही है.

लेकिन दिव्या सीधे पहुची बाहर लगे एक स्टॉल में जहां पहलवानों के कपड़े बिक रहे थे तब तक किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता. दिव्या ने अपना जीता हुआ मेडल पहलवानों के कपड़े बेचने वाले व्यक्ति के गले डाल दिया जो उसके पिता थे.
ऐसा भावुक पल केवल फिल्मों ही देखा जाता है लेकिन यह हकीकत में हुआ कि अंदर बेटी कुश्ती का फाइनल मैच खेल रही थी और बाहर पिता उसकी मां के सिले हुए पहलवानों के कपड़े बेच रहे थे.

इसी घटना ने सभी को ध्यान खींचा दिव्या की साधारण पृष्ठभूमि पर लेकिन उस वक्त माहौल जश्न का था हो भी क्यों न, यह दिव्या का पहला गोल्ड मेडल जो था राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में. हालांकि जुलाई में ही उसने एशियन चैम्पियनशिप में सिल्वर मेडल जीता था लेकिन यह मेडल और मौका दिव्या के लिए कुछ ज्यादा ही खास बन पड़ा था.
दिव्या की पहलवानी से चलता किसी तरह घर
दिव्या दिल्ली की रहने वाली है. उसकी मां पहलवानों के लिए कपड़े सिलती हैं और वे कपड़े उसके पिता सूरज काकरान बेचते हैं. घर की स्थिति अच्छी नहीं है लेकिन दिव्या चाहती है कि उसकी पहलवानी से वह घर की आजीविका में खासा योगदान दे जो हो नहीं पाता है.
दिव्या दिल्ली की रहने वाली है. उसकी मां पहलवानों के लिए कपड़े सिलती हैं और वे कपड़े उसके पिता सूरज काकरान बेचते हैं. घर की स्थिति अच्छी नहीं है लेकिन दिव्या चाहती है कि उसकी पहलवानी से वह घर की आजीविका में खासा योगदान दे जो हो नहीं पाता है.
हालांकि पिता सूरज का कहना है कि अभी उनका गुजारा दिव्या की कमाई से ही चल पा रहा है शायद यही वजह रही कि उसने इस चैम्पियनशिप में वह उत्तर प्रदेश की ओर से खेलने का फैसला किया क्योंकि उत्तर प्रदेश में चैम्पियन पहलवानों को अच्छी ईनामी राशि दी जाती है.
दिव्या 10 साल की उम्र से ही लड़कों के साथ पहलवानी में मुकाबला कर रही है. पहले बड़ी मुश्किल से एक लड़का मुकाबले के लिए तैयार हुआ था उसके पिता ने कहा था कि अगर वह लड़के को हरा देती है तो उसे पांच सौ रुपये ईनाम में मिलेंगे. लड़का काफी अच्छा पहलवान था लेकिन दिव्या ने पांच सौ रुपये जीत लिए और आज तक उसने उसे सम्भाल कर रखा है. पांच सौ रुपये की इस जीत के साथ ही दिव्या ने तय कर लिया था कि अब करियर कुश्ती में ही बनेगा.

Semifinal Bout - Sr. National Women - indore 2017 Divya Sain vs Navjot
Navjot is an experienced wrestler working for Railways. while Divya is fighting in the sr. Nationals for the first time. The match was a hardcore example of wrestling competition. The match ended a draw in the end , it tied up at 5-5 equal points, to both the wrestlers. The crowed couldn't tell the winner among the wrestlers. The match however went in the favour of Divya sain, becuase she has scored a double point, while Navjot secured all single points.
उत्तर प्रदेश केसरी - दिव्या पहलवान।
उत्तर प्रदेश केसरी - दिव्या पहलवान।
Thanks, Pahalwan ji ( Deepak Ansuia Prasad Bhardwaj)
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